डिजिटल डेस्क – फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रंगों का महापर्व होली इस वर्ष भी पूरे देश में पारंपरिक उल्लास, आस्था और भाईचारे के साथ मनाया जाएगा। ज्योतिष एवं धर्मशास्त्रों के अनुसार होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि ग्रह-नक्षत्रों, अग्नि तत्व और ऋतु परिवर्तन से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व भी है। इस दिन किए गए पूजन, दान, रंगोत्सव और पारिवारिक मिलन का वर्षभर के सुख-समृद्धि पर विशेष प्रभाव माना जाता है।
होली कब है और होलिका दहन की तिथि
पंचांग गणना के अनुसार वर्ष 2026 में फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 3 मार्च 2026 को पड़ रही है। इसी दिन रात्रि में होलिका दहन किया जाएगा, जबकि अगले दिन 4 मार्च 2026 को धुलेंडी अथवा रंगवाली होली उत्साह के साथ मनाई जाएगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार होलिका दहन प्रदोष काल में करना सर्वाधिक शुभ माना गया है। इस वर्ष होलिका दहन का शुभ मुहूर्त भद्रा समाप्ति के बाद सायंकाल लगभग 6:30 बजे से रात्रि 8:55 बजे तक रहेगा (स्थानीय समयानुसार आंशिक अंतर संभव)। भद्रा काल में होलिका दहन वर्जित माना गया है, इसलिए भद्रा समाप्त होने के पश्चात ही विधि-विधान से पूजन करना चाहिए। मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में होलिका पूजन, कच्चे सूत की परिक्रमा, अन्न की आहुति तथा नई फसल की बालियों का दहन करने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
होलिका दहन का धार्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व
धर्मग्रंथों के अनुसार होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। प्रह्लाद की भक्ति और होलिका के दहन की कथा लोकमानस में आस्था का आधार रही है। ज्योतिष दृष्टि से यह अग्नि शुद्धि का पर्व है। मान्यता है कि होलिका की अग्नि में पुराने दोष, रोगकारक तत्व और नकारात्मक ऊर्जा का दहन होता है। ग्रामीण अंचलों में आज भी नई फसल की गेहूं-जौ की बालियां भूनकर प्रसाद रूप में ग्रहण की जाती हैं, जिसे समृद्धि और अन्नवृद्धि का सूचक माना जाता है।
विज्ञापन के लिए संपर्क करे
Call / WhatsApp - 9826291862
रंगोत्सव का समय और परंपरा
होलिका दहन के अगले दिन प्रातःकाल से दोपहर तक रंग खेलने की परंपरा है। ज्योतिषाचार्यों का मत है कि सूर्योदय के बाद से मध्याह्न तक का समय रंगोत्सव के लिए शुभ रहता है। इस दौरान अबीर-गुलाल, फूलों के रंग और प्राकृतिक रंगों से होली खेलने से मनोवैज्ञानिक प्रसन्नता के साथ ग्रहों की शुभता भी बढ़ती है। संध्या के बाद रंग खेलने से बचने की सलाह दी जाती है।
ज्योतिष अनुसार कौन सा रंग शुभ, कौन सा अशुभ
होली पर रंगों का चयन केवल सौंदर्य नहीं बल्कि ऊर्जा का भी विषय माना गया है। प्रत्येक रंग किसी न किसी ग्रह, चक्र और मानसिक अवस्था से जुड़ा होता है।
शुभ रंग
लाल रंग – मंगल और सूर्य का प्रतीक। साहस, प्रेम, ऊर्जा और नेतृत्व क्षमता बढ़ाने वाला माना गया है। नए कार्य आरंभ करने वालों के लिए शुभ।
गुलाबी रंग – संबंधों में मधुरता, प्रेम और सामाजिक सामंजस्य बढ़ाता है। दांपत्य जीवन के लिए शुभ संकेतक।
पीला रंग – बृहस्पति से संबंधित। ज्ञान, धन, सकारात्मकता और आध्यात्मिक उन्नति का कारक। विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए विशेष शुभ।
हरा रंग – बुध ग्रह का रंग। उन्नति, व्यापार, स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन से जुड़ा। करियर व व्यवसाय में प्रगति का सूचक।
केसरिया/भगवा रंग – आध्यात्मिकता, त्याग, तेज और आंतरिक शक्ति का प्रतीक। साधना और पूजा से जुड़े लोगों के लिए श्रेष्ठ।
नीला (हल्का) – शांति, गहराई और धैर्य का प्रतीक। हल्का नीला रंग मानसिक स्थिरता देता है।
किन रंगों से सावधान रहने की सलाह
काला रंग – शनि का प्रतीक होने से भारीपन, उदासी और नकारात्मकता बढ़ाने वाला माना जाता है। होली पर इससे परहेज की सलाह दी जाती है।
अत्यधिक गहरा नीला – मानसिक दबाव और उदासीनता बढ़ा सकता है।
रासायनिक रंग – त्वचा, आंख और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के साथ नकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने वाले माने गए हैं।
धात्विक/चमकीले रासायनिक रंग – ग्रहों की अशुभता बढ़ाने वाले तथा त्वचा रोग कारक माने जाते हैं।
ज्योतिषाचार्य प्राकृतिक गुलाल, चंदन, हल्दी, पलाश, गुलाब व टेसू के फूलों से बने रंगों को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।
राशियों पर होली का प्रभाव
मेष – उत्साह, नए अवसर, करियर में गति।
वृषभ – पारिवारिक सुख, खर्च नियंत्रण आवश्यक।
मिथुन – मित्रता, नेटवर्किंग, सामाजिक लाभ।
कर्क – कार्यक्षेत्र में प्रशंसा, पद लाभ।
सिंह – मान-सम्मान, प्रतिष्ठा वृद्धि।
कन्या – स्वास्थ्य सजगता, रुके कार्य पूर्ण।
तुला – दांपत्य सुख, संबंधों में मधुरता।
वृश्चिक – निवेश सोच-समझकर करें।
धनु – यात्रा, नए संपर्क लाभकारी।
मकर – करियर उन्नति, जिम्मेदारी बढ़ेगी।
कुंभ – रचनात्मक सफलता, सामाजिक पहचान।
मीन – आध्यात्मिक रुचि, मानसिक शांति।
होली पर किए जाने वाले ज्योतिषीय उपाय
होली के दिन कुछ विशेष उपाय अत्यंत फलदायी माने गए हैं—
-
होलिका दहन की अग्नि की 3 या 7 परिक्रमा करें
-
गेहूं की बालियां भूनकर प्रसाद रूप में ग्रहण करें
-
घर की नकारात्मक वस्तुएं अग्नि में समर्पित करें
-
परिवार सहित पूजन करें
-
गरीबों को अन्न, वस्त्र व गुड़ दान करें
-
होली की राख तिलक रूप में लगाना शुभ माना गया है
मान्यता है कि इससे ग्रह दोष शांत होते हैं और वर्षभर सुरक्षा बनी रहती है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण दृष्टि से सावधानियां
विशेषज्ञों ने रासायनिक रंगों से बचने की अपील की है। त्वचा रोग, एलर्जी, आंख संक्रमण और श्वसन समस्याएं कृत्रिम रंगों से बढ़ सकती हैं। जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सूखी होली खेलने का भी संदेश दिया जा रहा है। फूलों की होली और हर्बल गुलाल को बढ़ावा देना पर्यावरण की दृष्टि से भी उचित है।
सामाजिक समरसता का पर्व
होली केवल धार्मिक या ज्योतिषीय पर्व नहीं बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। इस दिन लोग पुराने मनमुटाव भुलाकर गले मिलते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में फाग, ढोलक, चंग और लोकगीतों की परंपरा आज भी जीवित है, वहीं शहरी क्षेत्रों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, होली मिलन समारोह और सामूहिक उत्सव आयोजित होते हैं।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष की होली ग्रह-नक्षत्रों की दृष्टि से सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाली मानी जा रही है। शुभ मुहूर्त में होलिका दहन, प्राकृतिक रंगों से रंगोत्सव, दान-पुण्य और पारिवारिक सहभागिता जीवन में सुख, शांति और समृद्धि के द्वार खोल सकती है। रंगों का यह पर्व केवल बाहरी उल्लास ही नहीं बल्कि आंतरिक शुद्धि, संबंधों की पुनर्स्थापना और नई शुरुआत का संदेश भी देता है।
रंग, आस्था और ज्योतिषीय परंपराओं के संगम के रूप में मनाई जाने वाली होली भारतीय संस्कृति की जीवंतता और आध्यात्मिक गहराई का अद्भुत उदाहरण है।








